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फेयरवेल के नाम पर नियमों की तस्‍करी!मुंगेली के पीएम श्री स्वामी आत्मानंद स्कूल पर उठे गंभीर सवाल…

मुंगेली शुक्रवार 13 फ़रवरी 2026-

— बच्चों को दी गई कानून तोड़ने की “अनौपचारिक ट्रेनिंग”?**
मुंगेली। शिक्षा का उद्देश्य अनुशासन, जिम्मेदारी और मूल्यबोध होता है, लेकिन जब कोई स्कूल खुद नियमों का मखौल उड़ाने लगे, तो सबसे बड़ा सवाल उठता है—क्या हम आने वाली पीढ़ी को गलत उदाहरण देने में भी पीछे नहीं रह गए?

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मुंगेली के पीएम श्री स्वामी आत्मानंद स्कूल में फेयरवेल के नाम पर हुई घटनाओं ने यही चिंता पैदा कर दी है।
रैली बनी ‘रोड शो’, कानून बना दर्शक
सूत्रों के अनुसार फेयरवेल कार्यक्रम के दिन काली लग्जरी गाड़ियों का जमावड़ा बी.आर. साव मैदान में करवाया गया। इसके बाद इन्हें रैली की तरह स्कूल परिसर तक दौड़ाया गया।
इस दौरान—
कोई यातायात अनुमति नहीं,
कोई पुलिस निगरानी नहीं,
सुरक्षा मानकों का पालन नहीं,
और सबसे गंभीर—इन वाहनों में स्कूल के बच्चे शामिल थे।
ऐसा लग रहा था जैसे स्कूल परिसर नहीं, बल्कि किसी शक्तिप्रदर्शन की तैयारी हो रही हो।
क्या स्कूल प्रबंधन ‘अनजान’ था… या ‘अनदेखा’ कर रहा था?
सबसे बड़ा सवाल यहीं खड़ा होता है—
 क्या इतनी बड़ी रैली स्कूल की जानकारी के बिना हो सकती है?
 यदि जानकारी थी, तो अनुमति क्यों दी गई?
 और यदि जानकारी नहीं थी, तो प्रबंधन की निगरानी व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।
दोनों स्थितियाँ स्कूल को कटघरे में खड़ा करती हैं—
जानते थे तो मिलीभगत, नहीं जानते थे तो अक्षमता।
स्थानीय नागरिकों की चिंता: “क्या हादसे का इंतज़ार था?”
नागरिकों का कहना है कि यह पूरा घटनाक्रम सड़क सुरक्षा के लिए संभावित खतरा था।
लोगों का तर्क सरल है—
हादसा होना जरूरी नहीं, खतरा पैदा होना ही प्रशासनिक विफलता साबित करने के लिए काफी है।
फेयरवेल या नियमहीनता का प्रदर्शन?
फेयरवेल जैसे कार्यक्रम जहां छात्रों को संयम, मर्यादा और जिम्मेदार व्यवहार की सीख देनी चाहिए, वहीं इसे दिखावे, रैश ड्राइविंग और नियमों की अनदेखी का मंच बन जाना अपने आप में विचलित करने वाला है।

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सबकी नज़र अब जिला प्रशासन पर—कार्रवाई होगी या ‘औपचारिकता’?
अब लोगों की निगाहें जिला प्रशासन पर टिक गई हैं।
बड़े सवाल यह हैं—
 क्या इस मामले में मात्र पूछताछ कर इतिश्री मान ली जाएगी?
 क्या दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी जिससे दूसरे संस्थान भी सबक लें?
 या यह मामला भी ठंडे बस्ते में डालकर यह संदेश दिया जाएगा कि “स्कूल कानून से ऊपर हैं”?
अगर कार्रवाई नहीं हुई… तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, समाज के प्रति अपराध होगा।
बच्चे व्यवस्था की नींव होते हैं। यदि उन्हें ही नियम तोड़ने का प्रशिक्षण मिलेगा, तो भविष्य में समाज किस दिशा में जाएगा—यह सवाल हर अभिभावक और नागरिक को चिंतित कर रहा है।

RAHUL YADAV

Editor in chief

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