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अचानकमार में बाघ की मौत पर उठे सवाल — वन विभाग की नींद 6 दिन बाद क्यों खुली? मीडिया से दूरी क्यों?

मुंगेली- अचानकमार टाइगर रिज़र्व में बाघ की संदिग्ध मौत को लेकर वन विभाग के दावों पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विभाग ने प्रेस विज्ञप्ति में मौत का कारण दो बाघों के आपसी संघर्ष को बताया है, लेकिन जमीनी सूत्रों के अनुसार मिला शव कम से कम 5 से 6 दिन पुराना था।

वन विभाग द्वारा प्रेस विज्ञप्ति जारी

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि—
आखिर वन विभाग को बाघ की मौत का पता इतने दिनों तक क्यों नहीं चला? क्या रिज़र्व में नियमित पेट्रोलिंग नहीं होती? या फिर जानकारी छुपाने की कोशिश की गई?


मीडिया से परहेज़ क्यों? क्या छिपाना चाहता है विभाग?
स्थानीय पत्रकारों ने भी आरोप लगाया है कि अचानकमार प्रबंधन लगातार मीडिया से दूरी बनाकर रखता है। अधिकांश घटनाओं में विभाग जानकारी साझा करने से बचता है, और जब मामला बाहर आ जाए, तभी “गोदी मीडिया” शैली में तैयार की गई प्रेस विज्ञप्ति जारी कर औपचारिकता पूरी करता है।


इस बार भी बाघ की मौत की खबर बाहर आने के बाद विभाग ने अगले ही दिन लंबी-चौड़ी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी, लेकिन कई अहम बिंदुओं पर अब भी चुप्पी है—
विभाग ने 6 दिन पुराने शव की पहचान 1 दिन में कैसे कर ली?
अगर पेट्रोलिंग लगातार होती है, तो बाघ का शव जंगल में सड़ता-गलता पड़ा कैसे रहा?
क्या विभाग का प्राथमिक उद्देश्य घटना को छुपाना था?
स्थानीय मीडिया को मौके पर क्यों नहीं बुलाया गया?
क्या विभाग “क्लीन चिट” देने में ज्यादा रुचि रखता है, पारदर्शिता में नहीं?
सूत्रों के मुताबिक कई तथ्यों पर गंभीर संदेह
सूत्र बताते हैं कि शव की अवस्था देखकर स्पष्ट था कि मौत तात्कालिक नहीं, बल्कि कई दिन पुरानी है। ऐसे में विभाग द्वारा जल्दबाज़ी में घटना को “आपसी संघर्ष” बताना कई सवाल पैदा करता है।


यदि यह संघर्ष ही था, तो—
दूसरे बाघ को रोकने या ट्रैक करने की कार्रवाई पहले क्यों नहीं शुरू हुई?


क्या कैमरा ट्रैप इतने दिनों तक निष्क्रिय थे?
क्या फील्ड स्टाफ ने समय रहते गश्त नहीं किया?
कुछ भी छिपाने का प्रयास वन विभाग की साख को नुकसान पहुंचाता है
अचानकमार टाइगर रिज़र्व को देश के सुरक्षित बाघ आवासों में गिना जाता है, लेकिन यदि इसी तरह विभाग घटनाओं को दबाता रहा तो गंभीर घटनाएं बाहर आने से पहले ही नियंत्रित रिपोर्टों से ढक दी जाएंगी।


जवाबदेही जरूरी – जनता जानना चाहती है सच्चाई
बाघ राज्य का राष्ट्रीय प्रतीक है, और उसकी मौत कोई छोटी घटना नहीं। ऐसे में विभाग की यह चुप्पी और देरी कई सवाल पैदा करती है—


क्या विभाग में निगरानी सिस्टम कमजोर है?
क्या बाघों की वास्तविक स्थिति छुपाई जा रही है?


क्या घटना को “नॉर्मल नेचर बिहेवियर” बताकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश है?
घटना की सच्चाई सामने लाने और विभाग की भूमिका की जांच कराने की मांग अब तेज हो रही है। जनता और मीडिया अब वन विभाग से स्पष्ट जवाब की अपेक्षा कर रहे हैं—


“आखिर 6 दिन तक बाघ का शव जंगल में सड़ता रहा और वन विभाग सोता रहा?”

RAHUL YADAV

Editor in chief

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